संपादकीय

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ब्रह्मचारी गिरीश
संरक्षक संपादक

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एक शिष्य वही है, जो साधना करता है। चाहे वह कितना भी व्यस्त हो, उसके अंदर एक आनंद, साधना की महक, सुख बना रहता है। जो प्रात:काल ध्यान करे और सायंकाल जप, वह अपने जीवन की दिशा को सार्थक करता है। जो कभी ध्यान, प्राणायाम और सिमरन न करे, ऐसा व्यक्ति गुरु-शिष्य परंपरा का अंग नहीं हो सकता। जब शिष्य ही न रहे, तो गुरु की उपस्थिति का क्या अर्थ? संपूर्ण सृष्टि के प्रथम गुरु महादेव हैं। ज्ञान की यह परंपरा महादेव से चली और ऋषि वेदव्यास तक पहुँची। वेदव्यास ने वेदों को चार भागों में संहिताबद्ध किया, ब्रह्मसूत्र की रचना की, श्रीमद्भग्वद्गीता का भाष्य किया और वेदांत के प्रति श्रद्धा जगाई। संपूर्ण भारत में भ्रमण कर उन्होंने ऋषियों व आचार्यों को तैयार किया और उन्हें निर्देश दिया कि अपने-अपने क्षेत्रों में वह ज्ञान की धारा फैलाएँ। इसलिए गुरु पूर्णिमा, ऋषि वेदव्यास को समर्पित है। इस दिन हम उनको और समस्त ऋषियों-मुनियों, ऋषिकाओं, योगियों और योगिनियों को स्मरण करते हैं। हम उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं और याचना करते हैं कि हम भी उनके पदचिह्नों पर चल सकें। यह तभी संभव है जब शिष्य समर्पित भाव-दशा में हो।


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गुरु ही चेतनावान बनाते हैं

गुरु पूर्णिमा आषाढ़ मास में आती है। वैसे तो पूर्णिमा प्रत्येक महीने होती है, किंतु आषाढ़ की पूर्णिमा विशेष महत्व रखती है, क्योंकि उस दिन भारत में गुरुपूर्णिमा मनाई जाती है। उस दिन चन्द्रमा बादलों से घिरा रहता है और यह काव्यात्मक घटना है। गुरु में ऐसी अथाह करुणा होती है कि वह अपने शिष्यों के पूरे अंधेरे को पी जाता है और बदले में उन्हें अपना शीतल उजाला देता है। व्यास पूजा, अर्थात गुरु पूर्णिमा शिष्यों और साधकों के जीवन में एक दिव्य तिथि होती है। यह दिन हमें स्मरण कराता है कि क्या हमने सच्चे शिष्य होने का धर्म निभाया? क्या हमने अपने श्रीगुरु के वचनों का पालन किया, उनके ज्ञान को अपने जीवन में उतारा? यह पर्व आत्म-परीक्षण का अवसर देता है। एक सच्चा साधक जानता है कि जीवन मात्र भौतिक सुखों को इकट्ठा करने के लिए नहीं है। यह जीवन धर्म को समझने, उसे जीने और फिर धर्मपूर्वक अर्जित धन से संसार का संचालन करने के लिए मिला है। विवेक और वैराग्य के जागरण के लिए मिला है। गृहस्थ जीवन जीते हुए भी साधक सजग रह सकता है। विवाह करें, परिवार बनाएँ, पर स्मरण रहे कि शरीर और उससे जुड़े सुख नश्वर हैं। इसलिए भोग में लिप्त होकर चेतना को गिरने न दें। विशेषकर गृहस्थ के लिए यह जागरूकता अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि वह रोज संसार, बाजार और भोगवाद से घिरा होता है। वहीं यदि साधना प्रबल हो, तो वही गृहस्थ उत्तम साधक बन जाता है। एक शिष्य वही है, जो साधना करता है। चाहे वह कितना भी व्यस्त हो, उसके अंदर एक आनंद, साधना की महक, सुख बना रहता है। जो प्रात:काल ध्यान करे और सायंकाल जप, वह अपने जीवन की दिशा को सार्थक करता है। जो कभी ध्यान, प्राणायाम और सिमरन न करे, ऐसा व्यक्ति गुरु-शिष्य परंपरा का अंग नहीं हो सकता। जब शिष्य ही न रहे, तो गुरु की उपस्थिति का क्या अर्थ? संपूर्ण सृष्टि के प्रथम गुरु महादेव हैं। ज्ञान की यह परंपरा महादेव से चली और ऋषि वेदव्यास तक पहुँची। वेदव्यास ने वेदों को चार भागों में संहिताबद्ध किया, ब्रह्मसूत्र की रचना की, श्रीमद्भग्वद्गीता का भाष्य किया और वेदांत के प्रति श्रद्धा जगाई। संपूर्ण भारत में भ्रमण कर उन्होंने ऋषियों व आचार्यों को तैयार किया और उन्हें निर्देश दिया कि अपने-अपने क्षेत्रों में वह ज्ञान की धारा फैलाएँ। इसलिए गुरु पूर्णिमा, ऋषि वेदव्यास को समर्पित है। इस दिन हम उनको और समस्त ऋषियों-मुनियों, ऋषिकाओं, योगियों और योगिनियों को स्मरण करते हैं। हम उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं और याचना करते हैं कि हम भी उनके पदचिह्नों पर चल सकें। यह तभी संभव है जब शिष्य समर्पित भाव-दशा में हो। वह गुरु के प्रति झुका हुआ, अनुग्रह से लबालब हो, क्योंकि यह प्रेम का आदान-प्रदान है, बुद्धि का नहीं। गुरु से कोई कुतर्क नहीं किया जाता। शिष्यत्व ऐसी बात है, जो आप जीवन भर कर सकते हैं। शिष्य न मात्र आध्यात्मिक अर्थों में बनना है, वरन जीवन के प्रत्येक कदम पर हमें कुछ न कुछ सीखते रहना है। अनंत लोग भरे पड़े हैं, अनंत घटनाएँ घट रही हैं। आप सजग रहें और आपमें अहंकार की अकड़ न हो, तो बहुत कुछ सीख सकते हैं, सिखाने वाला छोटा बच्चा भी हो सकता है, कोई चींटी हो सकती है या कोई शिक्षक। हर घटना कुछ न कुछ सिखा सकती है, किंतु उसके लिए शिष्य होना आवश्यक है और वह बड़ी कठिन बात है। मनुष्य को सीखने के लिए जो विनम्रता, चित्त की सरलता चाहिए, जो सीखने को तैयार है, उसे अपनी अस्मिता और अहंकार को छोड़ देना पड़ता है, क्योंकि अहंकार सीखने न देगा। अहंकार आपको बदलने न देगा। अहंकार अपने से ऊपर किसी को रखने को कभी राजी ही नहीं है। सीखने को वह तैयार है, जिसने यह अनुभव कर लिया है कि अब तक अपने आप अनेक उपाय किए, पर कुछ भी सीख न पाया। सीखने को वही तैयार है, जिसने देख लिया अपने हृदय के गहन अंधकार को। जिसने देख लिया कि मैं अपने जीवन को मात्र उलझा रहा हूँ, सुलझा नहीं रहा, बल्कि जितना सुलझाने की प्रयास करता हूँ, बात और उलझती चली जाती है। ऐसे पीड़ा के क्षणों में, ऐसी संताप की अवस्था में अपनी परिस्थिति को पूरा-पूरा देखकर शिष्यत्व का जन्म होता है। गुरु तो सदैव उपस्थित है, सीखने वाले नहीं होते। 'भारत में बड़ी पुरानी लोकोक्ति है कि जब सतयुग था, तब गुरु की इतनी आवश्यकता न थी, किंतु कलियुग में गुरु की बड़ी आवश्यकता होगी। आखिर इसका क्या कारण है!... हम किस अनुसार से बाँटते हैं संसार को? सतयुग कहते हैं उस समय को, जब लोग बड़े सचेत थे, सावधान थे। और कलियुग कहते हैं उस युग को, जब लोग बड़े सोए हुए हैं, मूर्छित हैं।' अत: स्वयं को चेतनावान बनने के लिए परमपूज्य महर्षि महेश योगी जी ने भावातीत ध्यान योग को प्रतिपादित किया। भावातीत ध्यान योग का नियमित रूप से प्रतिदिन प्रात: एवं संध्या के समय 15 से 20 मिनट का अभ्यास आपकी मूर्छा का हरण कर आपको चेतनावान बनाने का प्रयास रहित माध्यम है।



।।जय गुरूदेव जय महर्षि।।