संपादकीय

ब्रह्मचारी गिरीश
संरक्षक संपादक

जितना शीघ्र हम स्वयं के सम्मोहन को त्याग कर सत्य का दर्शन करेंगे उतने शीघ्र ही हमारे जीवन में उन्नति की संक्रांति का उत्सव आयेगा। यह सच्चा जीवनोत्सव होगा जहाँ प्रतिदिन आनंद के सरोवर में सम्पन्नता एवं संतुष्टि का स्नान कर हम तृप्त हो जायेंगे। यही सच्चा आनंद है। परमपूज्य महर्षि महेश योगी जी सदैव कहते थे "जीवन आनंद है।"

भारतीय संस्कृति में एक वर्ष को दो भागों में विभक्त किया गया है, जिन्हें हम दक्षिणायन एवं उत्तरायण के रूप में जानते हैं। इन्हें याम्यायन एवं सौम्यायन के नाम से भी जाना जाता है। अर्थात् दक्षिणायन को याम्यायन एवं उत्तरायण को सौम्यायन कहते हैं। दक्षिणायन काल के व्यतीत हो जाने के उपरांत उत्तरायण का समय प्रारंभ होता है। उत्तरायण का प्रारंभ मकर संक्रांति से होता है। अर्थात् सूर्य जब मकर राशि में प्रवेश करता है, तभी से उत्तरायण प्रारंभ हो जाता है। संक्रांति शब्द का अर्थ होता है, सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करना।
अग्निज्योतिरह: शुक्ल: षण्मासा उत्तरायणम्। तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्मविदो जना:।।
यहाँ उत्तरायण को शुक्ल मार्ग से संबोधित किया गया है। शुक्ल मार्ग अर्थात् प्रकाश की बहुलता वाला मार्ग। नाम के अनुसार प्रकाश की बहुलता वाले मार्ग में यात्रा शुभदायक होती है, इसके विपरीत कृष्ण मार्ग अर्थात् अंधकार की बहुलता वाला मार्ग कष्टकारक होता है। अंधकार की बहुलता वाले मार्ग की यात्रा संघर्षपूर्ण होती है। अत: हमें भी स्वयं को अंधकार रूपी नकारात्मकता से प्रकाश की ओर अर्थात् सकारात्मकता की ओर अग्रसर होने का प्रयास करना चाहिए। क्या हम भी अपने जीवन में संक्रांति को धारण करना चाहते हैं या तिल-गुड़ से बने मिष्ठान ईश्वर को अर्पित कर स्वभोग लगाकर पतंग उड़ा कर उत्सव की इतिश्री कर लेंगे। सामान्यत: हम यही करते आये हैं। संक्रांति हमें सिखाती है कि हमारे जीवन का उत्तरायण हो रहा है या हम दक्षिणायन की ओर अग्रसर हैं। संक्रांति का शाब्दिक अर्थ है परिवर्तन, नवीनीकरण और प्रकृति की परिवर्तनशील शिक्षा का स्वागत करना। यह हमें सिखाती है कि परिवर्तन शाश्वत है और इसका स्वागत करना चाहिये। जिस प्रकार ऋतुएँ बदलती हैं वैसे ही हमारे जीवन में भी परिवर्तन आते हैं जिन्हें हमें सहजता से स्वीकार करना चाहिए। सूर्य का दक्षिणायन से उत्तरायण हो जाना हमें जीवन में सदैव सकारात्मकता के साथ अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रेरित करता है। हमारे जीवन का आधार आध्यात्मिक साधना से उन्नति ही है। यह अवसर नवीन फसल के लिये सूर्य व प्रकृति एवं ईश्वर के प्रति आभार व्यक्त करने का समय है। यह हमें प्राप्त समस्त सुख-सुविधाओं के लिये आभारी एवं संतोषी होना सिखाता है और हमें निस्वार्थ भाव से दूसरों की सहायता करने एवं समाज में समरसता लाने के लिए प्रेरित करता है। यह उत्सव प्रकृति का उत्सव है जो हमें प्रकृति के महत्व को समझाते हुए उसके संरक्षण एवं संवर्धन के लिये प्रेरित व जीवन के प्रति प्रोत्साहित करता है। हमें इस अवसर पर स्वयं का आकलन करना चाहिये कि हमारी वर्तमान परिस्थिति भूतकाल से अच्छी है, तो निश्चित ही भविष्य में हमारी उन्नति आकर्षक होगी और यदि वर्तमान हमारे भूतकाल से कम संतोष दायक है, तो हमें हमारी वर्तमान परिस्थिति का आकलन सत्य की पराकाष्ठा पर कर स्वयं को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने के लिए छोटे ही सही किन्तु प्रभावी प्रयास करने चाहिये क्योंकि हमारे जीवन की प्रत्येक परिस्थितियों के लिये सदैव हम ही उत्तरदायी हैं और यह सर्वविदित हो उसके पहले ही स्वयं की समस्त शक्तियों को संगठित कर स्वयं को आत्मिक रूप से सुदृढ़ बनाने के प्रयास में तुरंत ही लगना होगा। जितना शीघ्र हम स्वयं के सम्मोहन को त्याग कर सत्य का दर्शन करेंगे उतने शीघ्र ही हमारे जीवन में उन्नति की संक्रांति का उत्सव आयेगा। यह सच्चा जीवनोत्सव होगा जहाँ प्रतिदिन आनंद के सरोवर में सम्पन्नता एवं संतुष्टि का स्नान कर हम तृप्त हो जायेंगे। यही सच्चा आनंद है। परमपूज्य महर्षि महेश योगी जी सदैव कहते थे "जीवन आनंद है।"
।।जय गुरूदेव जय महर्षि।।