संपादकीय

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ब्रह्मचारी गिरीश
संरक्षक संपादक

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यदि हम 'प्राप्त ही पर्याप्त' की अवधारणा को स्वीकार कर लेते हैं तो हमें हमारे जीवन के प्रति रुचि या स्नेह जागृत हो जाता है, परंतु ऐसा करने के लिये आपको साहसी होना होगा। भौतिक जगत की प्राप्ती में हम ईश्वर प्रदत्त शरीर को मानसिक व शारीरिक रूप से प्रताड़ित कर रहे हैं। किसके लिये न तो स्वयं के लिये और न ही परिवार के लिये। हम प्रयासरत हैं, कि लोग हमारी प्रशंसा करें। क्यों भाई? ऐसी प्रशंसा के फेर में जीवन ही ढेर होता जा रहा है। हम न तो भगवान हैं और न ही पशु हैं। हम तो मनुष्य हैं। तो फिर हमें क्या आवश्यकता है भगवान बनने की या पशु बनने की, हम तो दैवीय संस्कारों और प्रकृति का अनुसरण करते हुए मनुष्य ही बने रहें।


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जीवन यात्रा

जन्म से लेकर मृत्यु तक जीवन एक यात्रा ही तो है एवं हमारी परिस्थितियां हमारे जीवनपथ का निर्धारण करती हैं। मनुष्य, जीवन की प्रत्याशा में जीवनभर अपने सामर्थ्य का प्रदर्शन करता है। और यही हमारे व्यक्तित्व की विशेषता या विलक्षणता है। हमारी सोच ही ऐसी है जो सहजता या सरलता से हमें प्राप्त हो जाता है उससे तृप्त नहीं होते और जो प्राप्त नहीं है उसे प्राप्त करने के लिये आनंदमय जीवन को ''संघर्ष'' में परिवर्तित कर लेते हैं। यदि हम 'प्राप्त ही पर्याप्त' की अवधारणा को स्वीकार कर लेते हैं तो हमें हमारे जीवन के प्रति रुचि या स्नेह जागृत हो जाता है, परंतु ऐसा करने के लिये आपको साहसी होना होगा। भौतिक जगत की प्राप्ती में हम ईश्वर प्रदत्त शरीर को मानसिक व शारीरिक रूप से प्रताड़ित कर रहे हैं। किसके लिये न तो स्वयं के लिये और न ही परिवार के लिये। हम प्रयासरत हैं, कि लोग हमारी प्रशंसा करें। क्यों भाई? ऐसी प्रशंसा के फेर में जीवन ही ढेर होता जा रहा है। हम न तो भगवान हैं और न ही पशु हैं। हम तो मनुष्य हैं। तो फिर हमें क्या आवश्यकता है भगवान बनने की या पशु बनने की, हम तो दैवीय संस्कारों और प्रकृति का अनुसरण करते हुए मनुष्य ही बने रहें। क्योंकि व्यक्तित्व में आमूलचूल परिवर्तन लाना अत्यंत कठिन है और वो भी संभव दैवीय कृपा से ही है। तो हमें करने के लिये क्या हैं? कहा जा सकता है कि जब ईश्वर हमारे सामने ही नहीं, तो हम उससे संवाद कैसे करें? वह हमारे सामने न सही, भीतर तो है न! उपनिषदों का मूलमंत्र है ''यथा पिण्डे, तथा ब्रह्माण्डे'' कि जो पिंड में है, वही ब्रह्मांड में है। जो आत्मा में है, वही परमात्मा में। इस हिसाब से कुछ-कुछ हमारे जैसा ही तो होगा वह। वह कॉस्मिक एनर्जी या ब्रह्मांडीय ऊर्जा है और हम सब उसके बहुत छोटे-छोटे भाग। यह भी हो सकता है, कि वह ब्रह्मांडीय ऊर्जा स्वयं हमारी नन्ही-नन्ही ऊर्जाओं का असीम विस्तार हो। मात्र ईश्वर नहीं रचता, अपने भीतर और बाहर प्रत्येक पल एक संसार हम भी रचते हैं। अपनी रचना देख और अनुभव करके प्रसन्न होते हैं, उदास होते हैं, भयभीत होते हैं, प्रेरित होते हैं। इस विराट सृष्टि में ऐसा कुछ नहीं, जो हमारे भीतर नहीं है। बस हमने स्वयं को नहीं पहचाना है। स्वयं की पहचान हो जाए, तो स्वयं संवाद भी हो सकता है। तो ईश्वर के आगे सदैव दयनीय याचक बनकर खड़े मत होइए। उसने बुद्धि-विवेक, शक्ति, प्रेम तथा करुणा से पूर्ण करके हमें इस पृथ्वी पर भेजा है। स्वयं को पहचानिए और स्वयं से बात कीजिए। पूछिए कि क्या हम वही हैं, जो हमें होना चाहिए था? स्वयं से भी कभी लड़-झगड़ लें। यही आत्म-साक्षात्कार है। कभी ऐसा करके देखिए, आपका अंतर्मन ईश्वरीय आनंद से भर जाएगा। हम स्वयं को जाने और स्वयं को जानना, फिर जीवन लक्ष्य का निर्धारण करना सरल नहीं है किंतु असंभव भी नहीं है। जब हम बांसुरी की मधुर तान सुनते हैं और उससे आनंदित होने के लिये हमें उस ओर अपने मन को एकाग्रचित करना होता है। इसी प्रकार जीवन-यात्रा को आनंदित बनाने के लिये बहुत अधिक दौड़-भाग की आवश्यकता नहीं है क्योंकि जो भी हमारे जीवन के लिये अति आवश्यक है वह सब मुफ्त में ही हमें प्राप्त है। हाँ अब बात आती है हमारी इच्छाओं की तो प्रत्येक इच्छा का विश्लेषण करना होगा कि उक्त इच्छित वस्तु की आवश्यकता क्षण भर की है या वह हमारी जीवन-यात्रा की ''सहयात्री'' है। यदि आप पाते हैं कि व क्षणिक आवश्यकता है और उसके अप्राप्त होने पर भी आपका जीवन चल सकता है, तो ऐसी इच्छाओं को तज दीजिये क्योंकि इस प्रकार की इच्छाओं की पूर्ति के लिये हम हमारे जीवन को 'आनंद' के स्थान पर 'संघर्ष' बना डालते हैं। अब प्रश्न उठता है कि हम कैसे जाने कि बलवती इच्छा हमारी सहयात्री है कि नहीं, तो उसके लिये परमपूज्य महर्षि महेश योगी जी ने ''भावातीत ध्यान-योग-शैली'' को प्रतिपादित किया है जिसके प्रात: एवं संध्या के समय नियमित 15 से 20 मिनट के अभ्यास से हम उन बलवती इच्छाओं की आवश्यकता का 'विश्लेषण' करने में हम धीरे-धीरे सामर्थ्य प्राप्त कर लेंगे और हमारा जीवन संघर्ष से आनंद की ओर जाने लगेगा क्योंकि जीवन आनंद है। संघर्ष नहीं।



।।जय गुरूदेव जय महर्षि।।