आवरण कथा
‘ बच्चा जब इस दुनिया में आता है, तो उसकी मुट्ठियाँ बंद होती हैं, पर कान खुले होते हैं। सच तो यह है कि उसके कान गर्भावस्था में भी आवाजों की टोह ले रहे होते हैं। गुजरते दिनों के साथ माँ की लोरी, पिता की आवाज, दादी की कहानी, आंगन की बतकही और गली-मोहल्ले की पुकार- यही सब धीरे-धीरे उसके भीतर एक अदृश्य संसार को आकार देते हैं। शब्दों का यह संसार इतना गहरा होता है कि जब बच्चा पहली बार बोलता है, तब वह मात्र भाषा नहीं बोल रहा होता, बल्कि अपने पूरे परिवेश का परिचय दे रहा होता है। इसीलिए किसी छोटे बच्चे के मुँह से कोई अपशब्द सुनकर पहले लोग चौंक उठते थे। उन्हें उस एक शब्द से उतना दु:ख नहीं होता था, जितना इस बात से कि यह शब्द आखिर उसके कानों तक पहुँचा कहाँ से! बच्चे शब्द गढ़ते नहीं, उन्हें विरासत में पाते हैं। सबसे बड़ी पैतृक सम्पत्ति कई बार मकान नहीं, भाषा होती है। ’’
भारत भाषाओं की भूमि है। यहाँ
भाषाओं की विविधता इतनी
अधिक है कि अलग-अलग
प्रदेशों में अलग-अलग बोलियाँ और भाषाएँ
प्रचलित हैं। हर कुछ किलोमीटर पर बोली
बदल जाती है। यह विविधता हमारी ताकत भी
है और कभी-कभी चुनौती भी।
इस बहुलता में भी जो भाषा देश के लोगों
को एक सूत्र में बांधती है, वह है हिन्दी। किंतु
जब हम हिन्दी की बात करते हैं तो यह समझना
आवश्यक है कि इसे अलग-अलग स्तरों पर
अलग-अलग रूपों में स्वीकार किया गया है-
जनभाषा, राजभाषा और राष्ट्रभाषा के रूप में।
इन तीनों की परिभाषा, उपयोग और महत्व में
सूक्ष्म अंतर हैं, जिन्हें समझना समाज और
राजनीति दोनों के लिए आवश्यक है।
जनभाषा के रूप में हिन्दी- जनभाषा
वह भाषा है, जिसे आम जनता अपनी बोली
और संवाद के लिए अपनाती है। भारत में
लगभग आधी जनसंख्या हिन्दी बोलती और
समझती है। भोजपुरी, अवधी, ब्रज, बुंदेली,
मगही, राजस्थानी जैसी बोलियाँ बोली की ही
छत्रछाया में आती हैं। जनभाषा के रूप में हिन्दी
मात्र उत्तर भारत तक सीमित नहीं है। यह देश के
दूसरे हिस्सों में भी प्रवास और रोजगार के
कारण एक साझा भाषा बन चुकी है। इस प्रकार
जनभाषा के रूप में हिन्दी का सबसे बड़ा गुण
इसकी लोकप्रियता और सहजता है।
हिन्दी राजभाषा के रूप में- भारतीय
संविधान में हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दिया
गया। सीधा आशय यह है कि केंद्र सरकार के
कामकाज में हिन्दी का प्रयोग किया जाएगा।
संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार
देवनागरी लिपि में हिन्दी भारत की राजभाषा
होगी। साथ ही अंग्रेजी को भी एक सहायक
राजभाषा के रूप में मान्यता दी गई। इसका
उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि केंद्र
सरकार के प्रशासनिक कामकाज, सचिवालय की भाषा, मंत्रियों के पत्राचार और कानूनी
दस्तावेजों में एक स्थिर भाषा का प्रयोग हो।
सरकारी दफ्तरों मंत्रालयों, प्रशासनिक
कामकाज और न्यायिक प्रक्रियाओं में हिन्दी का
प्रयोग करने के लिए कई नियम बनाए गए हैं।
व्यवहार में अनेक वर्षों तक अंग्रेजी का प्रभुत्व
बना रहा, पर सरकारी दμतरों, राज्य सरकारों
और संस्थानों में हिन्दी के उपयोग में भी निरंतर
बढ़ोतरी हुई है। राजभाषा के रूप में हिन्दी का
असल लाभ तब मिलता है जब आम आदमी
सरकारी सेवाओं तक हिन्दी के द्वारा पहुँचता है
और दस्तावेज, परामर्श हिन्दी में होने से लोगों
की भागीदारी बढ़ती है।
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