आवरण कथा

नई शिक्षा

‘ किसी देश की शिक्षा और उस देश की आर्थिकी का संबंध हमारे मनीषियों के एक श्लोक से समझा जा सकता है। विद्या ददाति विनयम्, विनयाद् यादि पात्रताम् पात्रत्वात् धनमाप्नोति। धनाद् धर्म: तत: सुखम्। अर्थात् विद्या से विनय आता है, विनय हमें प्रत्येक वस्तु के लायक बनाता है। जब निपुण बनते हैं तो धन की प्राप्ति होती है और फिर हमारे कल्याण स्तर में लाभ होता है। आधुनिक युग की अर्थव्यवस्था में शिक्षा की महत्वपूर्णता पर विचार करते हैं।
स्वतंत्रता के बाद भी नीति निर्धारण और उसका क्रियान्वयन उन्हीं लोगों के हाथों में बना रहा, जो ब्रिटिश सत्तासीनों की आज्ञानुसार कार्य करने के अभ्यस्त थे, जो चाहते थे कि उनके आगे आने वाली पीढ़ियां भी अपनी विशिष्टता का लाभ उठाती रहें। यह तभी संभव था जब सरकारी कामकाज और नौकरी में अंग्रेजी को ही महत्व मिलता रहे। इस सोच में परिवर्तन आया है, मगर अभी भी पलड़ा अंगे्रजी की ओर ही भारी दिखाई देता है। नई शिक्षा नीति इस स्थिति से निकलने का अवसर उपस्थित कराती है। क्षेत्रीय भाषाओं में तकनीकी विषयों की शिक्षा प्रदान करने की तैयारी हो रही है। मनसुख मांडविया जी से अनुरोध है कि वह अपने विचार अंग्रेजी में भी लिखते रहें। विचारों की गहराई महत्वपूर्ण है, अन्य सभी कुछ उसके समक्ष गौण है।’’

नई शिक्षा

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020- इक्कीसवीं सदी की पहली शिक्षा नीति है, जिसका लक्ष्य देश के विकास के साथ-साथ सांस्कृतिक मूल्यों को यथावत रखते हुए नैतिक, सामाजिक और भावनात्मक स्तर पर भी व्यक्ति का विकास करना है। सनातन भारतीय ज्ञान और विचार की समृद्ध परंपरा के आलोक में यह नीति तैयार की गई है। ज्ञान, प्रज्ञा और सत्य की खोज को भारतीय विचार परंपरा और दर्शन में सदैव सर्वोच्च मानवीय लक्ष्य माना गया है। इस परंपरा में ज्ञान को जीवन में अर्जन करने के लिए ही नहीं किंतु आत्मज्ञान और मुक्ति के रूप में भी माना गया है। प्राचीन भारत में विश्वस्तरीय संस्थानों ने अध्ययन के विभिन्न क्षेत्रों में शिक्षण और शोध के ऊँचे प्रतिमान स्थापित किये थे। इसका लाभ देश में नहीं किंतु विदेशों से आने वाले छात्रों और विद्वानों को भी मिलता था। इसी शिक्षा व्यवस्था ने चरण, सुश्रुत, आर्यभट्ट, वराहमिहिर, भास्कराचार्य, चाणक्य, गौतम, पतंजलि, गार्गी जैसे अनके महान विद्वानों को जन्म दिया, जिन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में प्रमाणित और मौलिक योगदान दिया।
आवश्यकता है आज ऐसी संस्कृति और दर्शन की जिसमें न मात्र नई पीढ़ी को लाभ मिले किंतु उससे समृद्ध नए- नए उपयोग का विचार हमारे मन में आए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति का विजन (दृष्टि पथ) छात्रों में भारतीय होने का गर्व न मात्र विचार में अपितु व्यवहार, बुद्धि और कार्यों में भी और साथ ही मान, कौशल, मूल्यों तथा सोच में भी होना चाहिए, जो वैश्विक कल्याण के लिए भी प्रतिबद्ध हो। इतनी पृष्ठभूमि में यह स्पष्ट हो रहा है कि देश की यह प्रथम ऐसी शिक्षा नीति बनी है, जिसमें भारतीय शिक्षा के गौरवपूर्ण इतिहास को प्राथमिकता से अनुभव किया गया है। आधुनिक शिक्षा व समाज में प्रयुक्त होने वाले 'शिक्षा-पद' एवं वैदिक साहित्य में प्रयुक्त "शिक्षा शब्द" में कितना साम्य और वैषम्य है सबसे पहले तो इसी पर विचार करना होगा। प्राचीन काल में शिक्षा शब्द की उत्पत्ति शिक्षा (पाणिनी 08-01-63) से मानी गई है जिसका अर्थ है सीखना। शिक्षा शब्द का मुख्य प्रयोजन शब्द शक्ति और सामर्थ्य का वाचक माना गया है। यह सामर्थ्य विद्या और ज्ञान प्राप्ति से संबंधित है।


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