अनुक्रमणिका
पृष्ठ क्र. 6
विश्व चेतना में सत्व का स्तर बनने से और जैसे-जैसे वेद विज्ञान विद्यापीठ के विद्यार्थियों की संख्या बढ़ेगी वैसे-वैसे विश्व चेतना में प्रतिदिन प्रात:-सायं इनके संयम के अभ्यास से वो परत की परत सतोगुण की विश्व चेतना में बढ़ती जायेगी और वो दिन दूर नहीं है जब यहाँ की शिक्षा पद्धति में जो साधना का तत्व है, जो एक समन्वय तत्व है, जो एक वेद तत्व है, जो एक पूर्ण विज्ञान तत्व है वह बढ़ेगा।...
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पृष्ठ क्र. 8
इस वर्तमान स्थिति में निजी स्कूलों की भूमिका काफी बढ़ गई है। राज्य के धीरे-धीरे पीछे हटने के साथ ही निजी संस्थानों ने इस रिक्तता को भरने का कार्य किया है। आज अनेक राज्यों में 50 प्रतिशत से अधिक बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं। हालाँकि, यह क्षेत्र अब भी बँटा हुआ है, जिसके कारण नवाचार का प्रसार सीमित हो रहा है।...
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पृष्ठ क्र. 10
अधिकतर लोग अच्छे समय की प्रतीक्षा में हाथ पर हाथ धरकर बैठे रहते हैं, किन्तु जो वर्तमान में जीते हैं, उनके लिए प्रत्येक दिन अच्छा होता है। इसे एक प्रसंग द्वारा अच्छी तरह समझ सकते हैं?एक संत अपने शिष्य के साथ यात्रा के लिए निकले। मार्ग में नदी मिली। उन्होंने अपने शिष्य से कहा कि नदी के किनारे बैठकर प्रतीक्षा करते हैं...
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पृष्ठ क्र. 12
सकारात्मक सोच में बहुत शक्ति होती है, किंतु मात्र इससे ही काम नहीं चलता है। यदि भय, संशय और मानसिक आघात बहुत गहरा हो तो मात्र शब्दों के द्वारा अपनी चुनौतियों से नहीं निपटा जा सकता है। इसके लिए अपने दिमाग को नई दिशा देना आवश्यक है। ध्यान लगाकर अपने अंतर्मन में जाया जा सकता है...
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पृष्ठ क्र. 44
ग्रीष्म अवकाश में दादी-नानी, मामा-बुआ के घर जाना एक परंपरा हुआ करती थी, जिसमें एक अद्भुत उत्साह होता था। वहाँ पहुँचते ही बच्चों को अपनापन, प्यार और खुलकर जीने का एहसास मिलता था। दिन भर खेलना, कहानियाँ सुनना, छत पर सोना, पेड़ों पर चढ़ना, घर के बने स्वादिष्ट व्यंजनों का आनंद लेना और बिना किसी बंधन के समय बिताना?ये सब छुट्टियों को खास बना देता था।
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