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महर्षि प्रवाह

भारत विश्व का सर्वोच्च शक्तिशाली राष्ट्र होगा
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ब्रह्मचारी गिरीश जी
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कार्पण्य दोषोपहत स्वभावत: प्रच्छामि त्वां धर्मसम्मूढ़ चेता:। यच्छेय: स्यान्निश्चित: ब्रूहितन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधिमां त्वां प्रपन्नम्।। गीता 2.7


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 भारत विश्व का सर्वोच्च शक्तिशाली राष्ट्र होगा

हमें भारत को विश्व की सर्वोच्च शक्ति बनाने की हमारी प्रबल इच्छा को व्यक्त करते हुये अत्यधिक आनंद हो रहा है और इस इच्छा का आधार हमारे ऐसा कर पाने की सामर्थ्य है। हमारे पास प्राकृतिक विधानों के उस स्तर का पूर्ण ज्ञान है जो समस्त विविधताओं का अजेय, शाश्वत्, अमर आधार है और यह वेद का ज्ञान है।

वेद शुद्ध ज्ञान की संरचना है जो अपने आप में प्राकृतिक विधानों की अनंत क्रियाशक्ति का समाविष्ट रखता है। हमने इस ज्ञान को सत्यापित किया है एवं पर्याप्त रूप से शुद्ध ज्ञान को सत्यापित किया है। जिसमें अनन्त सृजनात्मक सामर्थ्य है एवं जिसे किसी भी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह द्वारा उपयोग में लाया जा सकता है। प्राकृतिक विधान की इस अनंत संगठनात्मक शक्ति को मानव के अंतर्मन में जीवंत करके अजेयता प्राप्त कर लेना पूर्णतया हमारे अधिकार में है क्योंकि हमारी मनोरमा जन्मभूमि-मातृभूमि-वेदभूमि भारत वेद का स्थायी स्थान है, अत: भारत को पूर्णता और अजेयता से कुछ भी कम स्वीकारना अस्वाभाविक है।

अतीत में इसके पीछे जो भी कारण रहा है, प्रत्येक व्यक्ति इसस अवगत हे, हम उस पर एक क्षण की व्यर्थ नहीं करना चाहेंगे। किंतु आज हमारे पास प्राकृतिक विधानों की पूर्ण सृजनात्मक सामर्थ्य का वह व्यावहारिक ज्ञान है जिसे हम भारत को विश्व की सर्वोच्य शक्ति बनान में उपयोग कर सकते है। यह विचार समय की आवश्यकता को दृष्टिगत रखते हुए आता है। समय की मांग है कि राष्ट्रकुल में एक ऐसी सर्वोच्च अजेय शक्ति का उदय हो जो विश्व में आज की महाशक्तियों पर अधिकार रख सके।


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