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संपादक :  नीतेश परमार

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मेजर जनरल कुलवंत सिंह (सेवानिवृत्त)

डॉ. प्यारेलाल कादलबाजु

धर्मेंद्र सिंह ठाकुर

विद्वान और विद्यावान में अन्तर


विद्यावान गुनी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर॥


एक होता है विद्वान और एक विद्यावान । दोनों में आपस में बहुत अन्तर है। इसे हम ऐसे समझ सकते हैं, रावण विद्वान है और हनुमान जी विद्यावान हैं। रावण के दस सिर हैं । चार वेद और छह: शास्त्र दोनों मिलाकर दस हैं । इन्हीं को दस सिर कहा गया है । जिसके सिर में ये दसों भरे हों, वही दस शीश हैं । रावण वास्तव में विद्वान है । लेकिन विडम्बना क्या है ? सीता जी का हरण करके ले आया ।कईं बार विद्वान लोग अपनी विद्वता के कारण दूसरों को शान्ति से नहीं रहने देते । उनका अभिमान दूसरों की सीता रुपी शान्ति का हरण कर लेता है और हनुमान जी उन्हीं खोई हुई सीता रुपी शान्ति को वापिस भगवान से मिला देते हैं।

हनुमान जी ने कहावि-

नती करउँ जोरि कर रावन।
सुनहु मान तजि मोर सिखावन॥


हनुमान जी ने हाथ जोड़कर कहा कि मैं विनती करता हूँ, तो क्या हनुमान जी में बल नहीं है? नहीं, ऐसी बात नहीं है। विनती दोनों करते हैं, जो भय से भरा हो या भाव से भरा हो। रावण ने कहा कि तुम क्या, यहाँ देखो कितने लोग हाथ जोड़कर मेरे सामने खड़े हैं।

कर जोरे सुर दिसिप विनीता।
भृकुटी विलोकत सकल सभीता॥


यही विद्वान और विद्यावान में अन्तर है। हनुमान जी गये, रावण को समझाने। यही विद्वान और विद्यावान का मिलन है। रावण के दरबार में देवता और दिग्पाल भय से हाथ जोड़े खड़े हैं और भृकुटी की ओर देख रहे हैं। परन्तु हनुमान जी भय से हाथ जोड़कर नहीं खड़े हैं।

रावण ने कहा भी-

कीधौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही।।
देखउँ अति असंक सठ तोही॥


रावण ने कहा- ‘तुमने मेरे बारे में सुना नहीं है? तू बहुत निडर दिखता है!’ हनुमान जी बोले- ‘क्या यह जरुरी है कि तुम्हारे सामने जो आये, वह डरता हुआ आये?’ रावण बोला- ‘देख लो, यहाँ जितने देवता और अन्य खड़े हैं, वे सब डरकर ही खड़े हैं।’ ...(निरंतर)


जय गुरुदेव, जय महर्षि
-नीतेश परमार (संपादक)
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