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संपादकीय

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ब्रह्मचारी गिरीश
संरक्षक संपादक

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शाँति, आनन्द, उत्तम स्वास्थ्य, सहिष्णुता, सामन्जस्य, व्यवहार कुशलता जैसे शब्दों का लोप होता जा रहा है, प्रकाश पर अन्धकार भारी है। भारत के पास सर्वोच्च ज्ञान है, तकनीक है, साधन है किन्तु साधना की कमी के कारण और केवल मशीनीकरण के कारण जीवन में दु:ख ज्यादा है। आइये अपने जीवन को धन्य करें। कुछ समय अपने स्वयं के लिये निकालें और आनन्दमय जीवन व्यतीत करें।


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साधना- मानसिक रोंगों की चिकित्सा

भारत के हृदय प्रदेश मध्यप्रदेश, उसके दक्षिण में छत्तीसगढ़ और पश्चिम में राजस्थान तीन राज्यों के चुनाव का शोर सिर चढ़कर मचा। अबकी बार... की सरकार, गली-गली में शोर है... चोर है, ... संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं,...जिन्दाबाद,...मुदार्बाद, जीतेगा भाई जीतेगा...जीतेगा आदि सीधे कम और उल्टे नारों की गूंज गली-गली सुनाई दी। तेलंगाना और मीजोरम में शायद यही नारे स्थानीय भाषा में लगे होंगे। जनता की भीड़ ने किसको सुना, किसको अनसुना कर दिया, पता नहीं। बोलने और चिल्लाने वालों ने कोई कमी नहीं की। मयार्दाओं की अनेक सीमायें भंग हुयी , शर्म शर्मसार हुयी , तानों के न कितने ताने-बाने बुने गये, बहुतों का चरित्र हनन हुआ तो नई परम्परा में पुरूषों का चीर हरण भी होता दिखने लगा। वर्तमान के सभी पितामह, राजगुरु, दलगुरु, धर्मराज, भीम सब धृष्टराष्ट्र हो गये, मूक हो गये, उनकी कर्णेन्द्रियाँ जीर्ण हो गयी। सभी ने गांधी जी के तीन बन्दरों को आदर्श मान लिया और अपने-अपने कान, मुंह और आंखों को अपनी हथेलियों से बन्द कर लिया। जो अपने काम का था, उसके लिये सब खुला और बाकी के लिये सब बन्द। एक गीत सुना था- बुरा मत कहो, बुरा मत सुनो, बुरा मत देखो। बुरी है बुराई मेरे दोस्तों। बड़ा आदर्श गीत है, सभ्य बनने का श्रेष्ठतम फामूर्ला है। चुनाव परिणाम आ गये, तीनों प्रमुख प्रान्तों में भारतीय जनता पार्टी का शासन समाप्त हुआ, कांग्रेस की सरकारें गठित हुई । पराजित प्रत्याशी गम मनाते हुए अपनी-अपनी गुफा में विश्राम कर रहे हैं। विजयी प्रत्याशियों का सीना गर्व और अहंकार के चरम पर पहुंच गया, सब मंत्रीपद और वो भी महत्वपूर्ण मंत्रीपद पा लेने की दौड़ में सम्मिलित हो गये। अगले कुछ दिनों में मंत्री पदों की घोषणा हो जायेगी। इतना कहानी लिखकर यह पूछने का मन है कि किसको क्या मिला इस चुनाव से 'कुछ के विजयी होने और कुछ की पराजय से' बहुतों को पद और प्रतिष्ठा मिली। महालक्ष्मी के भण्डार की कुन्जी मिली, लाखों को अस्थायी सही पर रोजगार मिला। जिन पर महालक्ष्मी कुपित हुयी , उनकी जमानत जब्त हो गई, कुछ व्यापारियों को उनके बिलों का भुगतान होता नहीं दिख रहा, कल तक जिनकी पांचों अंगलियां घी में डूबी थीं अब उनके हाथ ठंड की खुश्की से फट रहे हैं। जो सीधे-सीधे राजनीति में थे उन्होंने कुछ पाया खोया। शहर की सड़क पर निकले तो देखा कि कल तक सारा शहर एक दल के पोस्टर, बैनर, होर्डिंग्स से पटा पड़ा था अब उनका स्थान नयी सरकार के चेहरों ने ले लिये। पुराने चुनचुन कर कहीं भेज दिये गये। अब आ जायें आम जनता की बातों पर। कुछ से हमने भी बात की। प्रमुख जिज्ञासा यह थी कि शासन करने वाली सरकारों ने खजाने का मुख खोलकर पानी या उससे भी पतले द्रव्य की तरह धन बहाया। धन भी सेकुलर हो गया। योग्य अयोग्य की चिंता किये बिना हर एक की जेब में प्रवेश कर गया। लेकिन धन पाकर भी नागरिकों ने सरकारों को पदच्युत कर दिया। एक बड़े अधिकारी और एक हारे हुए मंत्री से पूछा कि ये क्या हुआ ' आपने तो अपने क्षेत्र में बड़ा खेल खेला, फिर क्या हुआ' मंत्री जी बोले "अहसान फरामोश हैं ये सब, गद्दार हैं ये सब कितना किया इनके लिये पर ये सिला मिला मेरी सेवा का"। हमने पूछा - महोदय आप लोगों के अनुसार तो पैसा वोट खरीद सकता है, तो धोखा कहां हो गया? उत्तर में निराशा का भाव प्रकट हुआ। पराजय के दु:ख में होंठ हिले तो पर शब्द बाहर नहीं निकल पाये। पैसा सब कुछ खरीद नहीं सकता। यह बात महोदय को समझ में आ गई थी। मैं प्रसन्न था किन्तु कुछ ही क्षणों में शमशान वैराग्य की तरह पराजय का दु:ख जाता रहा। बोले "इन्वेस्टमेंट आज नहीं तो कल जरूर ब्याज देता है, बेकार नहीं जाता।" मैंने मन ही मन समय को प्रणाम किया और धन्यवाद दिया कि "कितनी जल्दी आप घाव भर देते हैं, धन्य हे आप समय देव"। देखा जाये तो आम नागरिक को उन चुनावों, उनके परिणामों और सत्ता परिवर्तन से कुछ प्राप्त नहीं होता। वो तो अपने जीवन की गाड़ी में पहले भी जुता था और अब भी उसे घसीट रहा है। आम आदमी (मेरा आशय आम आदमी राजनैतिक दल से नहीं है) का जीवन जैसे पहले था, आज भी वैसा ही है। मैंने अपनी संस्थान के कुछ कार्यकतार्ओं से पूछा कि आपकी आयु 40 या 50 वर्ष है, कितनी सरकारें आई और गई , आपको धन लाभ या हानि हुई? सबका एक ही उत्तर था "हमारे जीवन में कोई अन्तर नहीं आया।" फिर पूछा कि हर बार जनता किस आधार पर एक पार्टी की सरकार को उतार देती है और दूसरी पार्टी की सरकार को बैठा देती है? इसका उत्तर किसी के पास नहीं है। सब सरकारें प्राय: एक सी ही होती हैं, एक ही संविधान से चलती हैं। सब जनता की सेवा की बातें करते हैं, बड़े-बड़े वादे होते हैं। कुछ सचमुच तो कुछ छद्म रूप में निभा दिये जाते हैं। फिर मतदाता अपना मत और मन बदल क्यों देता है ? इसका बिल्कुल साधारण सा कारण है। साधारण भाषा में कहें तो जनता तनावग्रस्त है, उसे समझ नहीं आता है, वह शंसय की स्थिति मे है, चुनाव प्रसार और बायदों के प्रभाव से उसका मन विचलित हो जाता है, लालच में मन अस्थिर हो जाता है। घर से किसी को मतदान देने व्यक्ति जाता है और "इ.वी.एम", पर अंगुली किसी और बटन को दबा देती है। आज सारे समाज की सबसे बड़ी बीमारियां तनाव, चिन्ता, असुरक्षा, अनिष्ठा, थकावट की हैं। इन बीमारियों की चिकित्सा किसी चिकित्सक के पास नहीं है। इनको रोकने की कोई औषधि या वैक्सीन नहीं है। परम पूज्य महर्षि महेश योजी जी ने इन सामाजिक और मानसिक रोगों की रोकथाम के लिये भावातीत ध्यान की सर्वोच्च तकनीक दी है। विश्व में करोड़ों व्यक्तियों ने इसे सीखा है और नित्य इसका अभ्यास भी करते हैं लेकिन किसी की सरकार के द्वारा इनको आवश्यक रूप से सिखाने की व्यवस्था नहीं की गई। तनावग्रस्त जनता तनावग्रस्त सरकारों का गठन करती है और फिर वापस तनावों की वर्षा को झेलती है। शाँति, आनन्द, उत्तम स्वास्थ्य, सहिष्णुता, सामन्जस्य, व्यवहार कुशलता जैसे शब्दों का लोप होता जा रहा है, प्रकाश पर अन्धकार भारी है। भारत के पास सर्वोच्च ज्ञान है, तकनीक है, साधन है किन्तु साधना की कमी के कारण और केवल मशीनीकरण के कारण जीवन में दु:ख ज्यादा है। आइये अपने जीवन को धन्य करें। कुछ समय अपने स्वयं के लिये निकालें और आनन्दमय जीवन व्यतीत करें।



।।जय गुरूदेव जय महर्षि।।