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आवरण कथा

कुंभ जीवन अमृत

‘    लार्ड लिनलिथगो 1936 से 43 तक भारत के ब्रिटिश वायसराय थे। उन्होंने वर्ष 1942 में लगे कुंभ मेले का भ्रमण करना चाहा। उन्होंने महामन पं. मदनमोहन मालवीय के साथ हवाई जहाज में बैठकर ऊपर से मेले का निरीक्षण किया। मेले में जनसमूह का जो सागर उमड़ा था, उसे देखकर उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने मालवीय जी से प्रश्न किया-मालवीय जी इस स्थान पर एकत्रित होने के लिए जो निमंत्रण भेजे गए होंगे। उसमें काफी धनराशि लगी होगी। आपका अंदाजा क्या है कि इसके संगठनकतार्ओं को कितना व्यय करना पड़ा होगा। मालवीय जी ने हंसकर उत्तर दिया- सिर्फ दो पैसे। लॉर्ड लिनलिथगो ने कहा कि पंडित जी, क्या आप मजाक तो नहीं कर रहे हैं। मालवीय जी ने अपनी जेब से एक पंचांग निकाला और कहा कि इसकी कीमत दो पैसे है। इसी से लोग जानकारी प्राप्त कर लेते हैं कि कौन-सा विशेष दिन और समय मेले के लिए पवित्र होगा और स्नान के लिए यहां अपने आप चले आते हैं। प्रत्येक आगंतुक को व्यक्तिगत निमंत्रण भेजकर यहां बुलाने की जरूरत नहीं पड़ती।

   राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की आत्मकथा सेअपने ही शहर प्रयागराज में या हरिद्वार के स्नानों में या कुंभ मेले में, मैं जाता और देखता हूं कि वहां लाखों आदमी गंगा नहाने के लिए आते हैं उसी प्रकार जिस प्रकार कि उनके पुरखे सारे हिंदुस्तान से हजारों वर्ष पहले आते रहे हैं। चीनी यात्रियों के तेरह सौ बरस पहले के इन मेलों के वक्त को याद करता हूं। उस समय भी ये मेले बड़े प्राचीन माने जाते थे और कब से इनका आरंभ हुआ। यह कहा नहीं जा सकता। मैंने सोचा कि यह भी कितना गहरा विश्वास है जो हमारे देश के लोगों को अनगिनत पीढ़ियों से इस मशहूर नदी की ओर खींचता रहा है। ’’

कुंभ जीवन अमृत

     कुंभ पर्व सनातन धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जिसमें करोड़ों श्रद्धालु कुंभ पर्व स्थल हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक में स्नान करते हैं। इनमें से प्रत्येक स्थान पर प्रति बारहवें वर्ष और प्रयाग में दो कुंभ पर्वों के बीच छह वर्ष के अंतराल में अर्धकुंभ भी होता है। 2013 का महाकुम्भ प्रयाग में हुआ था। 2019 में प्रयाग में अर्धकुंभ मेले का आयोजन होगा।

  खगोल गणनाओं के अनुसार यह मेला मकर संक्रांति के दिन प्रारम्भ होता है, जब सूर्य और चन्द्रमा, वृश्चिक राशि में और वृहस्पति, मेष राशि में प्रवेश करते हैं। मकर संक्रांति के होने वाले इस योग को 'कुम्भ स्नान-योग' कहते हैं और इस दिन को विशेष मंगलिक माना जाता है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इस दिन पृथ्वी से उच्च लोकों के द्वार इस दिन खुलते हैं और इस प्रकार इस दिन स्नान करने से आत्मा को उच्च लोकों की प्राप्ति सहजता से हो जाती है। यहाँ स्नान करना साक्षात स्वर्ग दर्शन माना जाता है।

   पौराणिक विश्वास के साथ ही, ज्योतिषियों के अनुसार कुंभ का असाधारण महत्व बृहस्पति के कुंभ राशि में प्रवेश तथा सूर्य के मेष राशि में प्रवेश के साथ जुड़ा है। ग्रहों की स्थिति गंगा जल को औषधिकृत करती है तथा उन दिनों यह अमृतमय हो जाती है। यही कारण है कि अपनी अंतरात्मा की शुद्धि हेतु पवित्र स्नान करने लाखों श्रद्धालु यहाँ आते हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से अर्ध कुंभ के काल में ग्रहों की स्थिति एकाग्रता तथा ध्यान साधना के लिए उत्कृष्ट होती है। सभी हिंदू त्यौहार समान श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाए जाते है, पर यहाँ अर्ध कुंभ तथा कुंभ मेले के लिए आने वाले पर्यटकों की संख्या सबसे अधिक होती है।

   सागर मन्थन- कुंभ पर्व के आयोजन को लेकर दो-तीन पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं जिनमें से सर्वाधिक मान्य कथा देव-दानवों द्वारा समुद मंथन से प्राप्त अमृत कुंभ से अमृत बूँदें गिरने को लेकर है। इस कथा के अनुसार महर्षि दुवार्सा के शाप के कारण जब इंद्र और अन्य देवता कमजोर हो गए तो दैत्यों ने देवताओं पर आक्रमण कर उन्हें परास्त कर दिया। तब सब देवता मिलकर भगवान विष्णु के पास गए और उन्हे सारा वृतान्त सुनाया। तब भगवान विष्णु ने उन्हे दैत्यों के साथ मिलकर क्षीरसागर का मंथन करके अमृत निकालने की परामर्श दिया। भगवान विष्णु के ऐसा कहने पर समस्त देवता दैत्यों के साथ संधि करके अमृत निकालने के प्रयत्न में लग गए। अमृत कुंभ के निकलते ही देवताओं के इशारे से इंद्रपुत्र 'जयंत' अमृत-कलश को लेकर आकाश में उड़ गया। उसके बाद दैत्यगुरु शुक्राचार्य के आदेशानुसार दैत्यों ने अमृत को वापस लेने के लिए जयंत का पीछा किया और घोर परिश्रम के बाद उन्होंने बीच रास्ते में ही जयंत को पकड़ा। तत्पश्चात अमृत कलश पर अधिकार जमाने के लिए देव-दानवों में बारह दिन तक अविराम युद्ध होता रहा।

   इस परस्पर वर्चस्व के समय पृथ्वी के चार स्थानों (प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक) पर कलश से अमृत बूँदें गिरी थीं। उस समय चंद्रमा ने घट से प्रस्रवण होने से, सूर्य ने घट फूटने से, गुरु ने दैत्यों के अपहरण से एवं शनि ने देवेन्द्र के भय से घट की रक्षा की। कलह शांत करने के लिए भगवान ने मोहिनी रूप धारण कर यथाधिकार सबको अमृत बाँटकर पिला दिया। इस प्रकार देव-दानव युद्ध का अंत किया गया। अमृत प्राप्ति के लिए देव-दानवों में परस्पर बारह दिन तक निरंतर युद्ध हुआ था। देवताओं के बारह दिन मनुष्यों के बारह वर्ष के तुल्य होते हैं। अतएव कुंभ भी बारह होते हैं। उनमें से चार कुंभ पृथ्वी पर होते हैं और शेष आठ कुंभ देवलोक में होते हैं, जिन्हें देवगण ही प्राप्त कर सकते हैं, मनुष्यों की वहाँ पहुँच नहीं है। जिस समय में चंद्रादिकों ने कलश की रक्षा की थी, उस समय की वर्तमान राशियों पर रक्षा करने वाले चंद्र-सूर्यादिक ग्रह जब आते हैं, उस समय कुंभ का योग होता है अर्थात जिस वर्ष, जिस राशि पर सुर्य, चन्द्रमा और बहृस्पति का संयोग होता है , उसी वर्ष , उसी राशि के योग में जहा-ँ जहाँ अमृत बूँद गिरी थी, वहा-ँ वहाँ कुम्भ का पर्व होता है ।


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